Sunday, 28 April 2013

हम बदलें या वो बदलें अब
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अब  तो  पौरूष  शर्मशार हो

अब तो कब्र में गुनहगार हो

हम  बदलें या वो बदलें  अब

जो  भी हो पर  आर-पार  हो

गिरिराज भंडारी
चंद लम्हे तो तनहाईयों में दम ले लूं
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ग़मे हयात से छूटूं तो तुझे याद करूं

या फ़िर, तेरे मिलाने की फ़रियाद करूं

चंद लम्हे तो तनहाईयों में दम ले लूं

फिर खयालों में तेरी याद को आबाद करूं

गिरिराज भंडारी
सितमगिरी उनकी क्या पहचानता नहीं
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उनकी बेवफाई क्या मैं जानता नहीं

सितमगिरी उनकी क्या पहचानता नहीं

मै तो अपने आप को समझा भी लूं मगर,

दिल बड़ा ज़िद्दी है, कहा मानता नहीं

गिरिराज भंडारी

Wednesday, 17 April 2013

ये ग़लत है ,जानता हूं ,मगर नही करूंगा ( मुक्तक)



ये ग़लत है ,जानता हूं ,मगर  नही करूंगा ( मुक्तक)
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खुशियां तुम्हारे संग मै सफर नही करूंगा
ये ग़लत है ,जानता हूं ,मगर  नही करूंगा
मुझमें उदासियां भी रहती है घर बनाके
उनको निकाल कर के बेघर नही करूंगा
गिरिराज भंडारी  
उनकी बेवफाई क्या मैं  जानता नहीं
सितमगिरी उनकी क्या पहचानता नहीं  
मै अपने आप को समझा भी लूं मगर,
दिल बड़ा ज़िद्दी है, कहा मानता नहीं 

गिरिराज भंडारी  






Sunday, 14 April 2013

मैंने अपने घर का दरवाज़ा तोड़ दिया है

मैंने अपने घर का दरवाज़ा तोड़ दिया है
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चलो अच्छा हुआ
तुम्हारी खुशी तुम्हे मिल गई ,
मुझे भी खुशी है
कि तुम तो खुश हो,
मैं चाहता भी यही था,
तुम खुश रहो,
वैसे भी तुम्हें खिलखिलाता देख मैं  बहुत खुश होता था।
सो मैं खुश हूँ।

खैर जाने दो,इन बातों को,
मैं तनहा वैसे भी नही हूँ,
पहले तुम साथ थीं,
अब वो हसीन यादे हैं,
तुम तो वक़्त बेवक़्त कभी जुदा हो भी जाती थीं,
पर,
ये कमबख्त तो मुझे नींद में भी नही छोड़ते,
मैं खुश हूँ । तुम्हारी यादों के साथ ,

मैं वैसे भी बोलता कम था,
तुम न कहती थी,
कभी कभी तो बोला करो,
बहुत खामोश रहते हो,
मैं  मुस्कुरा दिया करता था,
अब कोई है ही नही बात करने के लिए
अब भी मैं चुप हूँ,
फ़र्क़ क्या हुआ,
कुछ भी नहीं,
मैं खुश हूँ ।

कुछ परेशानियाँ है, दुःख हैं,
वो तो पहले भी थीं,
हाँ,परिभाषायें बदल गई हैं,
कारण बदल गए हैं,
उससे निपटने का तरीक़ा बदल गया है,
इन सबके बावजूद जीना पहले भी पड़ता था,
अब भी जी रहा हूँ ,
मैं खुश हूँ ।

लेकिन,

मुझे ईश्वर पर भरोसा है, और
ईश्वरीय न्याय पर भी,इसलिए,
सोचता हूँ शायद कभी ऐसा भी हो,
कि,
तुम्हारा अंतर्मन कभी तुम्हे ऐसा कुछ कह दे,
कि,
दौड़ आओ वापस,
अपने इस पुरानी दुनिया में,
और कहीं ऐसा ना हो,
मैं आवारा,
अकेला भटकता रहूँ कहीं और,
बंद मिले दरवाज़े ,
इसलिये,
मैंने अपने घर का दरवाज़ा तोड़ दिया है।    
                                  गिरिरज भंडारी





   
 मैं वो लम्हे खुशी के फ़िर से खोज लाऊंगा।
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  ग़मे जीस्त तू छिपा ले जहाँ भी ले जा कर,       ( ग़मे जीस्त= सांसारिक दुःख )
 मैं वो लम्हे खुशी के फ़िर से खोज लाऊंगा।                                                                      
 वो दबे पांव भी फ़िर आ न सकेगा तुम तक,
 वो लबे बाम भी पहुंचा,तो मैं जग जाऊंगा।
 फ़िर मुझे क़ैद करने की, ना कोशिश करना,
 मैं कपूर हूँ, बंद  डिब्बे से  भी  उड़  जाऊँगा।
                                   गिरिराज भंडारी 








                                                                     








हल निकालने में हर कोई मसखरा है

हल निकालने में हर कोई मसखरा है
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ख़्वाब  देखता  हूँ  गुलशन  हरा-हरा है
हर फूल और पौधा लेकिन डरा  डरा है

अफ़सोस मेरे दोस्त,सवाल पर यही है
देश लाचारी से क्यों इस  क़दर भरा  है

सोचता रहता हूँ, तनहा कभी कभी  मैं  
देश का हर  सिक्का खोटा या  खरा  है

पहुंचा दिया कैसे मुकाम पे  हालत  ने
शंका से भर गया हूँ,यकीन  भी ज़रा है

इसकी टांग खींचे या उसकी टांग खींचे
इंसान सबके अंदर रहता मरा मरा है

है इतनी समस्यायें,हो बाढ़ जैसे आई
हल निकालने में हर कोई मसखरा है                             
                       गिरिराज भंडारी   




कहीं पे आग लगी है धुंआ सा लगता है

कहीं पे  आग  लगी  है  धुंआ  सा  लगता  है
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ख़याली भीड़ में घिरा-घिरा सा लगता है 
खुद ही अपने से बेगाना हुआ सा लगता है 

घूम आया है वो सारा शहर बेख़ौफ़ मगर
तेरी गलियों में क्यूँ डरा-डरा सा लगता है 

खूब समझाया ज़िन्दगी ने तज़ुरबों से मुझे
दिल का कोना कभी सहमा हुआ सा लगता है

मुझे अंजाम, ग़मनाक फ़साने का हर इक
कभी घटा हुआ, कहा-सुना सा लगता है

काले बादल  जो उठे हैं, नहीं  बारिश के
कहीं पे आग लगी है, धुंआ सा लगता है

प्यास इस जगह क्यूं तेज़ हुए जाती है
कहीं छिपा हुआ, मुझको कुआँ सा लगता है

ऐसे बिगड़े हुए हालत, और उनके हाथों में
कोई मरहम है,वो भी झुनझुना सा लगता है
                                   गिरिराज  भंडारी
   







जागे हुए लगे सभी , यूँ कि शशर हुए

जागे  हुए लगे  सभी , यूँ  कि शशर  हुए
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उनकी आमद से ज्यूँ  ही हम बाख़बर हुए
अन्दर से भरभराये हम तितर बितर हुए 

मेरी फ़ितरत में मुझे , हरदम कमी दिखी
इक  बार जो  मेरे  हुए , वो  उम्र  भर  हुए

ये चाँद, ये  सूरज  ये, अन्धेरा, ये उजाला
कभी ये इधर हुए तो  कभी वो  उधर हुए

किसकी निगाह फ़िर गई ये तो पता नहीं
लेकिन  हमारे  शेरो  सुखन  बेअसर  हुए 

बस कुछ दीवारें तोड़ के आने  की बात थी,
खंडहर जहाँ  के सारे, अब हमारे घर हुए

लगता है परिंदों को,फिर अंदेशा हो गया  
तैयार  उड़ानों   के  लिए   बालोपर   हुए

दिल  का मेरे कोना कोई  सूना तो हुआ है
ऐसा  भी नहीं  है कि  यारों,  दरबदर हुए

करवट कोई जमाना, लेने  को  है शायद 
जागे  हुए लगे  सभी , यूँ  कि शशर  हुए

इमानो वफ़ा, रखें न रखें, उनका फैसला
हम  तो  भाई  कह  के यारों बेखबर हुए
                                 गिरिराग भंडारी







 




Friday, 12 April 2013

रचनाकार: गिरिराज भंडारी की 3 ग़ज़लें

रचनाकार: गिरिराज भंडारी की 3 ग़ज़लें

इन्हें मयखाना नाम दें तो इसमे क्या खराबी है

तुम्हारी झील सी आँखों में, जो डोरे गुलाबी है
कई आशिक इन आँखों के, कई आँखे शराबी है
कई बेखुद पड़े हैं, होश अब तक आ नहीं पाया 
इन्हें मयखाना नाम दें, तो इसमे क्या खराबी है



Monday, 8 April 2013

स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी को शत शत  नमन ----
आजादी दे दिए हमें,खुद आजाद हो गए 
रु  ब रु  थे  कभी , बस अब  याद हो गए 
आप ही आयें, सम्हालें, इस देश में तो हम 
ऎसी मिली आजादी कि ,बरबाद हो गए