Saturday, 2 February 2013

जब भी मिलती  है वो, नाम  क्यों  सुझाती है?
क्या कीजिए उन्हें, कि हया भी नहीं  आती है?
राह  भटकों  में  मेंरा  नाम ना जोडें , कि मुझे,
तारीक़ियाँ ख़ुद जल के,सही रास्ता दिखाती हैं।
जादू बाक़ी है कुछ, अभी भी  इन फ़िजाओं में,
ये  सरसराती  हवाएं भी  गीत  वही  गाती  है।
तमन्ना  है  दिल  में , देखूँ  तो कैसे लगती है,
किसी की ज़िन्दगी जब खुल के मुस्कुराती है।
फ़िर उसी उम्मीद के  ज़ेरे असर है  दिल मेरा ,
फ़िर सबा  उनका ही,   सलाम लिए आती है।




 

    
 

Thursday, 31 January 2013

यादों को  सम्हालो मत , कभी बेहद सताती है,
ख़तम जो गीत हो चुके,उन्हें दोबारा से गाती है।
सब मुझसे पूछते हैं क्या हुआ,कैसे हुआ,बोलो,
कोई समझाये उनको भी,ये बात मेरी ज़ाती है।



छोड़िये पत्थरों को कहकशाँ न कीजिए


छोड़िये पत्थरों को कहकशाँ न कीजिए
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लफ़्ज़ों में नहीं आयेंगे, बयाँ  न कीजिए,
मेरी ख़ामोशी का  यूँ  दरमाँ न कीजिये।    

पोशीदगी  भी   ज़रूरी  है  रिश्तेदारी  में,
ऱाज  महफिल में तो, अयाँ न  कीजिये।

ये  कैसी तकल्लुफ़ है, कैसी रवादारी   है     
मुझे मेरे घर में तो, मेहमाँ  न  कीजिये।

उनकी  यादें  मुश्किल से  सोई  हैं  अभी,
कहीं भी जाइये, शोर  यहाँ  न  कीजिये।

ज़ख्म  पैरों  के  इस रास्ते से वाकिफ़ हैं,
छोड़िये,पत्थरों को कहकशाँ न कीजिए।   

सफ़रे ज़िन्दगी की,ज़ईफ़ी ही मंज़िल है,
खींच तान कर ख़ुद को जवाँ न कीजिए।

ख़ूब हल्ला है अभी तूफान का, समंदर में,
कश्ती अभी  साहिल से  रवाँ न कीजिए। 


                        गिरिराज भंडारी
दरमाँ=इलाज,  रवादारी=शिष्टाचार
कहकशाँ=आकाशगंगा,  ज़ईफ़ी=बुढापा

  



Wednesday, 30 January 2013

ये कबूतर करामाती है, इसे बस पाल के रखना।

 ये कबूतर करामाती है, इसे बस पाल के रखना
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ये कबूतर करामाती है, इसे बस पाल के रखना।

तड़प ख़ुद रास्ता दिखाती है, सम्हाल  के  रखना,


इन  अंधेरों  से  लड़ना  दीयों को  ख़ूब   आता है,

बस दो-चार, चौखट पर, हमेशा बाल  के रखना।


सदियों से ज़माने की मुहब्बत  से खिलाफ़त है ,

ख़्वाबों में मिलेंगे हम ,नज़र से बोल के रखना ।

साहिल में खड़े रह कर समन्दर पार क्या होगा,

जो उड़ना है आसमाँ  में,परों को तोल के रखना।

सीधे रस्ते समझ आते नहीं है क्यूँ कर तुमको ?

अबस हर घड़ी ख़ुद को किसी जंजाल में रखना।

बदल चुकी  हैं मियारें, अभी चुन चुन के देखेंगे,

जो भी चीज़ रखना तू, बहुत कमाल के रखना।

कह ले तू ,जो जी चाहे,इजाज़त है तुझे लेकिन,

दिल खोल के  रखना,बिना  सवाल के  रखना।

मैं  तुम्हे चाहता हूँ ,
तुम आज जैसी भी हो,
स्वीकार करता हूँ तुम्हे
तुम्हारी तमाम अच्छाईयों के साथ
तुहारी हर कमजोरियों के साथ,
तुम्हे चाहता हूँ मैं आत्मा से
आत्मा तक, तुम्हारी
क्योंकि प्रेम का निवास आत्मा में ही है,
आत्मा की खुराक भी प्रेम ही है।
प्रेम से प्रेम तक
प्रेम को प्रेम से बस ...गिरिराज 10.22 बजे रात  

छोड़ दे बाँह मेरी , ख़ुद मुझे सम्हलने दे

छोड़ दे बाँह मेरी , ख़ुद  मुझे  सम्हलने दे
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इलाज-ओ -मुदावा  अभी  से ,  रहने   दे ,   मुदावा=उपचार 
ज़रा सा दर्द तो बढने  दे ,अभी  सहने  दे।

जो  मंज़ूर  है, बुलंद  सर  का  झुक जाना,
तो अंजुमन में मुझे , मेरी  बात  कहने दे।

तय है, कभी सड़ जाएयेगा  ठहरा   पानी,
किसी बहाने से, कभी तो  इसे  बहने  दे। 

तेरे मैख़ाने की  लग्ज़िश नहीं है ,ऐ साक़ी,  लग्ज़िश=लड़खड़ाना 
छोड़ दे बाँह मेरी , ख़ुद  मुझे  सम्हलने दे।

साथ चलते हुए , रस्ते बदल  भी  जाते हैं,
जब  तक  जो चले   साथ , उसे चलने दे।

ये  दिल प्यार समझने के कहाँ क़ाबिल है,
ग़मों  की गोद में कुछ और अभी पलने दे।  
   
खिज़ां की  क़ैद से मैं, बहार छीन लाया  हूँ,
अब बड़े शौक़ से,फ़ूलों को अभी खिलने  दे।
                                   गिरिराज भंडारी 


 

Tuesday, 29 January 2013

कर के देखो ये हवन कुछ, और है

अंदर तक की ये जलन,कुछ  और है,
दिल को लगी ये चुभन,कुछ  और है।
कल कही थी बात, वो कुछ  और थी,
कांटी छांटी ये  कथन, कुछ   और है।
कुछ  भला  परिणाम  आएगा ज़रुर,
हर तरफ़ लगी लगन, कुछ  और है।
प्रकृति का हर दृश्य कुछ सिखा रहा,
नागों भरा, संदली वन, कुछ और है।
नगर- नगर, हर डगर,  देखा असर,
अब के जो लगी अगन,कुछ और है।
गर्त   में  जाती  दिखी  है   सभ्यता,
अब हवाओं  में  चलन कुछ और है।
ख़ुद के अन्दर भस्म कर कुरीतियाँ,
कर  के  देखो ये हवन कुछ, और है।
हर नदी,तालाब,सागर,जल ही जल,
इस देश में गंगो-जमन कुछ और है।
पर देश के  नक़्क़ाल, वहाँ पर  सुनो,
आबो-हवा,रहन-सहन कुछ और है।
                      गिरिराज भंडारी