Monday, 8 July 2013

अभी तो प्रवक्ता ही बोले हैं


अभी तो प्रवक्ता ही बोले हैं
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प्रकृति तो खामोश है , चुप है ,
अभी भी,
ये उसका बोलना नही है
धोखे मे ना रहें !
चुप चाप देख रही है
सहन कर रही है
ज्यादतियाँ
अपने ऊपर होते  हुये !
ये जो कुछ भी हुआ
गुस्सा नहीं है , प्रकृति का
इशारा है महज ,
वो भी ,
प्रक़ृति के प्रवक्ताओं का !
नदी, पहाड़ , झील, झरने
जंगल, धुन्ध , आन्धी , तूफान
सागर , ज्वालामुखी
और ना जाने , कौन कौन प्रवक्ता है !
ये तो बस इशारा है ,
सावधान होने का !
प्रक़ृति के प्रवक्ताओं का,
अभी तो प्रकृति , खामोश है , शांत है
अभी पकृति का बोलना बाक़ी है
अब भी मजबूर किये तो
एक दिन , बोलेगी, प्रकृति भी !!
” प्रकृति की गोद में खेलें, गोद से ना खेलें ”
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                         गिरिराज भंडारी

अब तो समझो


अब तो समझो
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प्रक़ृति में,
सब जानते है
सब मानते है
ध्वनि की प्रतिध्वनि
वैसे ही होती है !
जैसे ध्वनि की गई थी 
गालियों के बदले , गालियां
मंत्रों के बदले मंत्रोच्चार
और तालियों के बदले , तालियां!!
लेकिन, सब ये नही जानते
या , स्वार्थवश मानना नही चाहते
कि सारा ब्रम्हांड
कर्मोंके लिये भी प्रतिध्वनि केन्द्र है
ठीक वैसी ही घटनायें प्रकृति लौटायेगी
जैसा हमने किया !!
फिर चाहे हमने प्रकृति के खिलाफ किया हो
या , किसी भी इंसान के खिलाफ !!!
कब होगा, कैसे होगा , कहां होगा
कितना होगा
सब प्रकृति तय करेगी !!!!
हम या तुम नही
गिरिफ्तारी नही ,अदालत नही,कोई सुनवाई नही ,
प्रकृति स्वयं अदालत है , जज है ,
सीधे सजा की शुरुआत ,
भुगतना सबकी मजबूरी है
निर्माण के बदले निर्माण , विनाश के बदले विनाश !!!!!
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गिरिराज भंडारी

Sunday, 30 June 2013

हम भी, माँ काली सभी होते रहेंगे



हम भी, माँ काली सभी होते रहेंगे 
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क्या ख्वाब ही ख्वाब संजोते रहेंगे
और काम  के वक़्त में  सोते रहेंगे

जिस जगह दादा कभी कुर्सी में बैठे 
सुन रहे हैं उस जगह पोते रहेंगे

अब तो अमृत वृक्ष के पौधे उगायें
कब तलक ज़हर ही हम बोते रहेंगे ?

मुस्कुराहट पे हमारा भी तो हक़ है
कब तलक घुटते रहें,रोते रहेंगे ?

उनकी साजिश है, दीवारें उठें ,पर
क्या हमारी शक्ति हम खोते रहेंगे ?

रक्त बीजों की तरह बढ़ते अगर हैं
हम भी, माँ काली सभी होते रहेंगे

           गिरिराज भंडारी

तासीर में ये सभी शरारे *******************



तासीर में ये सभी शरारे
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हर तरफ आंसुओं की धारे हैं
उनकी खामोशियाँ भी मारे हैं

आओ तूफाँ से दोस्ती कर लें
फिर कहेंगे कि हम किनारे हैं

हद हैवानियत की आ पहुँची
इंसानियत को बहुत उतारे हैं

फिर बचाने को कई आयेंगे
बालीवुड के बडे सितारे हैं

लफ्ज़ इनको न समझना यारों
तासीर में  ये सभी शरारे हैं               ( शरारे =चिंगारी )

मुझे बहलाने की कोशिश छोड़ें
नज़र के आगे , सब नज़ारे हैं

हम में कुछ साजिशों चंगुल के 
और कुछ चुप्पियों के मारे हैं 

             गिरिराज भंडारी



Tuesday, 7 May 2013

हंगामों से ही बहलने लगा है



हंगामों से ही बहलने लगा है
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समा फिर से देखो बदलने लगा है
समन्दर का पानी उछ्लने लगा है

हर इक दिल डरा है,हर इक मन मे शंका
हर इक रूह से कुछ पिघलने लगा है

ज़बां पे है गाली, दिमागों मे ग़ुस्सा
हर कोई अब, हथेली मसलने लगा है 

इंसान भारत का पहले कहां था
गिर के कहां तक फिसलने लगा है 

निज़ामों से इस बार भी कुछ न होगा
यही सोच के दिल दहलने लगा है

मगर क्या करें, आज लोगों का मन फिर
हंगामों से ही बहलने लगा है

गिरिराज भंडारी