Wednesday, 6 March 2013

काबर रिसाये रे सरकार हमर ले

काबर  रिसाये  रे  सरकार  हमर  ले ( छत्तीसगढ़ी भाषा में  )
**************************
काबर रिसाये रे सरकार हमर ले
देवथस दुनिया ल,अउ लेवथस हमर ले

पीरा कर थे जांघ, हाथ पाँव टुट गे
लकवा ह मार दिस मुड़ी से कमर ले

कमाइ पुरै नइ, महंगइ बाढ़ गे
सकबे त सकले, नई तो पसर ले

सब्बो मन  भ्रष्ट, चारों मुड़ा बइमान
मनखे ले जनावर, तहूँ ह गिर ले

उधारी बाढ़ी होगे हे,लुकावत फिरत हों
बजार हाट रेंगथों, मैं तीरे-तीर  ले

                          गिरिराज भंडारी

   


 

Friday, 1 March 2013

कुछ आधुनिक दोहे

      
          कुछ आधुनिक दोहे
व्यापारी  जितना बडा उसको उतना  छूट
आंख मूंद के मिडिल को चाहे जितना लूट

चाहे जितना लूट, कि   भूखा -नंगा  करदे
बचे –खुचे तो  महंगाई  को आगे   कर  दे

ऐसे  लूट  मचाईये, भारी  हो   हर   सांस
टैक्स ऐसा लग रहा,जूं गले फंसी हो फांस

गले फंसी हो फांस,दाना  पानी को  तरसे
आन्दोलन कर मांगे,तो फिर  डंडा   बरसे

धरम जाति के नाम पे, सौ -सौ दंगा होय  
जनता बम से फट मरा, जूं ना  रेंगा कोय
खून लाल हर आदम के, सब्बौ नेता एक रंग 
छोड़े ये जनता किसको,अरु किसको राखे संग                      
 
 
 गिरिराज भंडारी

Tuesday, 26 February 2013

मिलूँ तुमसे,कि तुम्हें याद करूं ?

है तवील  यादों का अलग  मज़ा                                                  
है जो  रू ब  रू  तो  अलग   नशा 
          मिलूँ तुमसे,कि तुम्हें  याद करूं  ?
ग़मे  हस्ती  है,    ग़में जाना भी
राहे पुर ख़तर है ,   जमाना भी 
          मैं किसके लिये फ़रियाद करूं ?
कभी नाराज हैं ,  मुस्कुराना भी
है कभी यकीं,     आजमाना भी
       क्या  खुद  पे  ही  मैं बेदाद  करूं ?
कभी  पेशो  पस में घिरा  है  तू
कभी  रिवायतों  से   डरा है  तू
        तू  कहाँ बंधी ?जो आजाद  करूं ?
                                गिरिराज भंडारी
     

Saturday, 23 February 2013

हम हँसे, रो पड़ें, उनको इस से क्या

हम हँसे, रो पड़ें, उनको इस से क्या
*************************
हम जियें या मरें उनको इससे क्या
हम हँसे, रो पड़ें, उनको इस से क्या

घर हमारा, दर हमारा,हम  हमारे हैं
तोड़ दें,फोड़  दें, उनको  इससे  क्या

हाथ मेरे, पैर मेरे, ये जिस्म मेरा है
काट  लें,नोच लें, उनको इससे क्या

खाना मेरा, पेट मेरा , पानी  मेरा है
खा लें कि छोड़ दें उनको इससे क्या

जान मेरी, दिल मेरा, गाड़ी  मेरी है
बचा लें,  भेड़ दें, उनको इससे क्या

कलम मेरी, मर्जी मेरी,बात मेरी है
चुप रहें, छेड़ दें, उनको  इससे क्या 
                  गिरिराज भंडारी





Friday, 22 February 2013

आंकड़ों से आइये रोटी बनाएं हम

  आंकड़ों से आइये  रोटी  बनाएं हम
 **************************
आइये   आंकड़ों  से  रोटी  बनाएं  हम
आंकड़ो की दाल-सब्जियां पकाएं हम 
                     आंकड़ों से आइये  रोटी बनाएं हम
खाली खाली थालियाँ, कटोरियां
खाली गिलास पेट में सजाएं हम । 
                    आंकड़ों से आइये  रोटी  बनाएं हम
आंकड़ों की हो ज़मीन, आंकड़ों के बीज हों

आंकड़े हल-बैल हों,आंकड़े मजदूर हों
                     आंकड़ों से आइये रोटी  बनाएं हम
आंकड़ा ही खेत हो,आकड़ा ही खाद हो
आंकड़ो की धार से पानी पिलायें हम
                      आंकड़ों से आइये  रोटी  बनाएं हम
आंकड़े खलिहान हों,आंकड़े दरबान हों
आदमी भूखा मरे,आंकड़े  बलवान हों
                        आंकड़ों से आइये  रोटी  बनाएं हम
आंकड़े है देवता,आंकड़े है धूप- दीप
आंकड़े कपूर हो,प्रसाद भी हो आंकड़ा
                         आंकड़ा को आंकड़ा ऐसे चढ़ायें हम 
आंकड़ो खेल हो,आंकड़ों का मेल हो
दिया आंकड़ों का हो,आंकड़ो तेल हो 
                         अंधेर महंगाई  का  ऐसे जलाएं हम
                 
                              चलो आंकड़े की फसल  उगायें  हम
                              आंकड़ों से आइये  रोटी  बनाएं हम
                                      गिरिराज भंडारी
                          

Thursday, 14 February 2013


        लघु कथा-" सड़ांध "


जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म में रुकी,मैंने जल्दी से अपना बैग उठाया और नीचे उतरा । मन में हड़बड़ी थी,आधी रात का समय और ये स्टेशन भी छोटा सा था। मन में शंका थी कहीं कोई रिक्शा तांगा नही मिला तो घर पहुंचना मुश्किल हो जायेगा। खैर बाहर निकला तो शंका निर्मूल साबित हुई,किस्मत अच्छी। एक मात्र तांगा सवारी के इन्तिज़ार में खड़ा हुआ था। मैं जल्दी जल्दी क़दम बढ़ाया ताकि पीछे आने वाली सवारी से पहले मैं तांगा लेलूँ ।
मोल भाव किये बगैर मैं धम्म से तांगे में  बैठा और बोला, चलो!!रस्ते में पता बताता हूँ । तांगा चलने के बाद मैं निश्चिन्त हुआ । तब अचानक मैं महसूस किया की तेज़ बदबू मेरी नाक में घुसे जा रही है। मैंने सोचा आसपास कोई गन्दा नाला या घूरा होगा थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो साफ़ हवा मिलेगी। परन्तु सड़ांध से पीछा नही छूटा ।तब विचार आया  कि तांगे वाला तांगा साफ़ नही करता शायद,वर्षों पुरानी सीट है सड़ गई होगी या मुझसे पहले वाली सवारी ने शायद सीट में कुछ गिरा दिया हो। अँधेरे में कुछ समझना,खोजना कठिन था।  मजबूरी थी ,जेब से रुमाल निकाल कर मैं  नाक में रख के बैठा रहा।मन ही मन कोसता रहा , एक मात्र  तांगा न होता तो बीच रस्ते में छोड़ देता। लग रहा था जल्द से जल्द घर पहुचूँ तो पीछा छूटे।  खैर भाई किसी तरह मैं घर पहुंचा आशा के अनुरूप सामने दरवाज़ा खोल के पत्नी और मेरा लड़का इन्तिज़ार करते मिले।मन ही मन मोबाईल को धन्यवाद् कहा,ये न होता तो दरवाज़ा खुलवाना आधी रत को मुश्किल होता। पैसे दे कर बैग ले कर मैं   गेट की ओर बढ़ा तो  लड़का उधर से पापा कहते हुए दौड़ा,पास पहुँच के जैसे ही पैर पड़ने के लिए झुका वैसे ही पीछे हट गया औरपीछे पलट कर बोला माँ ! पानी ले कर आओ पापा के जूते में गन्दा लगा है,कहाँ से खूंद के आ रहे है, बहुत गंदी  बास आ रही है । मैं आवाक रह गया और रस्ते भर आये विचारों पर अन्दर कहीं शर्मिन्दा होता रहा। 
                                                                                                                                   गिरिराज भंडारी  

Tuesday, 12 February 2013

उत्साह दिख रहा है,लगता वो मौसमी है

उत्साह दिख रहा है,लगता वो मौसमी है
*****************************
आसमां अलग है, और अलग जमीं  है
मिलते नहीं हैं  दोनों,ये आँख की कमी है 

रात  के  दामन में ज़ुर्म वही है, फ़िर 
सुबह के माथे में फिर वैसी ही ग़मी है

जब से आरजू की आरजू है  दिल में
तब  से  तारी  कोई  जैसे   बरहमी  है          बरहमी-खिन्नता,

जानने को है क्या हँसी की सचाई में 
झांकती आँखों में देखी अभी नमी  है

आदर्श जो  सजे हैं  आलमारियों   में
झाड़ पोंछ कर ले, कुछ धूल सी जमी है  

परहेज़ आप इनसे करते हों न करते हों 
जो आज चल रही हैं हवायें, पश्छिमी है

थोड़ा सी और जान डालिए,अभी तो   
उत्साह दिख रहा है,लगता वो मौसमी है
                       गिरिराज भंडारी