Sunday, 10 February 2013

अपने घर में सूकून पाए हम

अपने घर में  सूकून  पाए हम
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क्या कभी ख़ुद से भी कर पाए हम?        
काम पुरखों के ही गिनाये हम

ता कि हों जाए दया के लायक 
ख़ुदी को इस क़दर गिराएं हम ?                                                

खूब देखी है रौनक़े दुनिया 
अपने घर में  सूकून  पाए हम 

महफ़िल, वो न रास आई हमें 
बेवज़ह कैसे  मुस्कुरायें हम

ज़िद पे दिल आज मेरा फिर है 
चल वही गीत गुनगुनाये हम   

सारी दुनिया की फ़िक्र करते रहे  
इस तरह ख़ुद से  दूर आये हम 


सच से मुह कब तलक छिपायेंगे                                     
क्यूँ न अब हौसला दिखाएँ हम  
          
                  गिरिराज भंडारी 


 
  

















  




 

 




                      

Saturday, 9 February 2013

कहां की चीज़ थी,मैंने कहाँ रख दी?

कहां की चीज़ थी,मैंने  कहाँ रख दी?
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कुछ  सोच  कर मैंने  भी हाँ रख दी,
कहां की चीज़ थी,मैंने  कहाँ रख दी?

वो ले जाये, जिसमें भी हिम्मत  है,
लो  मैंने हर चीज़  दरमियाँ रख दी।

वो गूंगे हैं, बदले में चंद  सिक्कों के,
मुंह बंद  किये,गिरवी  ज़ुबां रख दी।

मैं  भी लाया था जवाब  में कुछ,वो
तुहमतें, लानतें कहाँ  कहाँ रख दी|

ता कि,वो काट दें मेरी  दलीलों को,
उन्होंने सामने आहो  फुगाँ रख दी।

कभी तो टूटे कहीं से चुप्पी, उसने ,
सामने मेरे,सारी कहानियाँ रख दी 
                               गिरिराज भंडारी



 






Thursday, 7 February 2013

बुनियादें फिर से हिल न जाये कहीं

दरारें,  घर  न   लील    जाये     कहीं,
बुनियादें फिर से  हिल न जाये कहीं।
आग, पानी से   मिल  न जाये  कहीं 
कोई  सूरत   निकल  न  जाये  कहीं।
फ़िर  वही    शोर,  वही   साजिश  है,
लोग  फ़िर से  बहल  न  जाये  कहीं।
अब न  लक्ष्मण, न  उसकी  रेखा है,
हदें, हया  से, पिघल  न  जाये  कहीं।
झूठ  ने   मुँह   बहुत    बड़ा    खोला,
वो  सारा सच  निगल न जाये  कहीं।
सियासी    रास्तों   में  फिसलन   है,
पाँव, देखो  फिसल   न  जाये   कहीं ।
दबा रखें   है ,पर अभी भुलाया नहीं,
मसला फिर से उछल न जाये कहीं।
माहौल  बन   रहा  है,  बदले   कुछ,
माहौल खुद ही, बदल न जाये कहीं।


गिरिराज भंडारी,भिलाई,सेक्टर,4  
   
 







  

Tuesday, 5 February 2013

तारीक़ियाँ ख़ुद जल के,सही रास्ता दिखाती हैं



जब भी मिलती है तो,वो नाम क्यों सुझाती है?
क्या कीजिए उन्हें, कि हया भी नहीं  आती है?

राह  भटकों  में  मेंरा  नाम  ना जोडें , कि मुझे,
तारीक़ियाँ ख़ुद जल के,सही रास्ता दिखाती हैं।

जादू बाक़ी है कुछ, अभी भी  इन  फ़िजाओं में,
ये  गुनगुनाती  हवाएं  भी गीत  वही  गाती है।

तमन्ना   है  दिल  में , देखूँ  तो कैसे  लगती है,
किसी की  ज़िन्दगी  जब खुल के मुस्कुराती है।

फ़िर उसी उम्मीद के ज़ेरे असर  है दिल मेरा ,
फ़िर  सबा  उनका  ही,सलाम लिए आती है।




Monday, 4 February 2013

हर एक सम्त का हंगामा, मगर कहता है

हर एक सम्त  का  हंगामा, मगर कहता  है
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चलो  मैं  चुप हुआ , ज़माना अगर कहता है,
हर एक सम्त  का  हंगामा, मगर कहता  है।                       सम्त-ओर
  
उनकी  दरिंदगी , बेदिली   के  अफ़साने  तो,
कट़  के  गिरा  हुआ हर  एक  सर  कहता है।

कितना भटका हूँ, तड़पा हूँ, ये न पूछो मुझसे
सहरा-ओ-दश्त का  हर एक शज़र  कहता है                         शज़र -पेड़

सर पे साया मेरे,उन हांथों का कुछ ऐसे पड़ा
मेरा  दुश्मन भी मुझे जाने जिगर कहता है।

ना प्यार,ना शिकवा , ना गुफ्तगू ना सुकूत ,                         सुकूत-शांति
रहने  वाला मगर उसी को  ही घर कहत़ा है।

ह्क़्के   गुफ्तार  पे  पहरे  अगर  लगे   होंगे,                       
इधर जो  कह  न सका बात, उधर कहता है। 

ख़ुदा   बचाये  मुझे   ऐसे    ग़मगुसारों    से,                        
इब्तिदाई बात में जो अगर-मगर कहता है।                   इब्तिदाई---शुरुवाती   
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 ह्क़्के   गुफ्तार--बोलने का अधिकार
 ग़मगुसारों--दुःख में हाल पूछने वाले

                             गिरिराज भंडारी 

Saturday, 2 February 2013

किसी को उदास देख कर

      किसी को उदास देख कर
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तनहाइयों  से  निबाह  मत  करना,
ख़ुद  की ख़ातिर गुनाह मत करना।

ख़याल  आते  हैं,  सताते हैं,   मगर 
चले भी जायेंगे,परवाह मत करना।
दुनिया देख के,हँसेगी,मज़ा लेलेगी,
दर्द  में   आह-आह    मत   करना।
गर्क़ बेड़ा किया,जिस ख्वाहिश  ने,
फिर  उसी  की  चाह  मत  करना ।
जेह्नियत में ज़हर बुझाये फिरते हैं , जेह्नियत= धारणा,विचार 
उनसे बस रस्मोराह  मत  करना।
मौक़े बहुत है, लम्बी  है  ज़िन्दगी,
तू  बस, उनको तबाह मत करना। 
      गिरिराज भंडारी  -3/2/2013


 



जब भी मिलती  है वो, नाम  क्यों  सुझाती है?
क्या कीजिए उन्हें, कि हया भी नहीं  आती है?
राह  भटकों  में  मेंरा  नाम ना जोडें , कि मुझे,
तारीक़ियाँ ख़ुद जल के,सही रास्ता दिखाती हैं।
जादू बाक़ी है कुछ, अभी भी  इन फ़िजाओं में,
ये  सरसराती  हवाएं भी  गीत  वही  गाती  है।
तमन्ना  है  दिल  में , देखूँ  तो कैसे लगती है,
किसी की ज़िन्दगी जब खुल के मुस्कुराती है।
फ़िर उसी उम्मीद के  ज़ेरे असर है  दिल मेरा ,
फ़िर सबा  उनका ही,   सलाम लिए आती है।